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भीड़

भीड़ में चलते लगा मैं यह सोचने विचार यह है कितना उचित? जाने अनजाने मिलते हैं रोज़ चेहरे अलग अलग कर रहे कुछ ना कुछ खोज .. मैं जेब में हाथ डाल धीमे क़दमों से मस्तक उठा मंद मंद मुस्काता चलता रहा नज़र मिली तो देखता रहा उन आँखों में छिपी रोज़ की आशाएं और उम्मीदें .. कुछ कंधे झुके हुए तो कुछ खिले हुए से कुछ आँखें चमक रही थी तो कुछ धुंध में रास्ता खोज रही थी मस्ती में अपनी कुछ चल रहे थे तो कुछ मस्त दिखने की कोशिश में और मैं तो अपनी ही धुन में  आस पास देखता हुआ चला जा रहा था.. हर किसी का है अपना ही अस्तित्व ..फिर भी हैं वे सभी ख़ास .. प्रतीत होता है कभी कभी कहीं भ्रम हो यही विचार ! अपने को विशिष्ट समझ मैं भी चल रहा था उस भीड़ में ना जाने कब कौन कहाँ दिखे कोई नहीं जानता कौन साथी मिले इस जीवन खेल में.. मशान की भूमि में तो मिलना ही हम सब ने यह एक नीति है सब की एक ही स्याही से लिखी जो महाकाल ने फिर क्यों भीड़ से डर चलें धुंध में .. गर्व से चलो सत्य की ओर भीड़ हो या डगर सुनसान ही हो |