घाट की पाठशाला
घाट पर खड़ा मै देख रहा था, लोगों को अपनों को ढोए हुए. कल तक जो जीवंत थे आज मृत की संज्ञा पाए हुए थे.. यमुना का जल मंद गति से बह रहा था मानो उन लोगों के अश्रुओ का प्रतिनिधित्व कर रहा था.. वायु मे स्थित शान्ति उनके ह्रदय के भारीपन को मानो सहला रही हो . काठ की चिता बनाना ही एकमात्र कर्म हुआ ,उसकी रचना ही सबसे बड़ा पुण्य थी वहां. . शिव भजन की धुन सूचक थी,मृत अब मुक्त हुआ परन्तु सत्य से अभी भी हर कोई अनभिग्य था.. चिता की ज्वाला रौद्र हो रही थी अट्टहास था मनुष्य की सान्तता पे परन्तु वह भी शांत हुई .. सब प्रशंसा ही करने मे थे, मित्र हो या रिपु ,मृत आज...