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II आनंद स्वरूप II

संसार को समझने निकला है तू ओ मानव! कैसी विडंबना है की तू न समझ पाया अपने ही दानव.. कण कण में व्याप्त है तेरे यह संसार, इस सत्य का कर तो ज़रा सा अपनी बुद्धि में संचार.. ना लगेगी घी की बाती और ना ही लगेगा कोई पुष्प या फ़ूल, गर तू जगा दे हृदय में अलख निरंजन और कर दे सहस्त्रदल कमल चैतन्य.. चाहिए केवल एक चिंगारी हर वाहन के ईंधन को, उसकी कृपा और तेरा अटल विश्वास ही है वह शोला जो जगा दे ज्ञान की ज्वाला को.. अज्ञान में खूब खाली तूने ठोकर अब तो कुछ संभल जा , तोड़ दे बंधन और आडंबर , पकड़ ले उस सत् को जो तेरे चित्त में है बैठा बनकर आनंद स्वरूप .. बनकर आनंद स्वरूप.

II चंद्र का चंचल प्रश्न I

पूर्णिमा कि रात्रि में जब चंद्रमा अपने रूप पर इठला रहा था , तो सहसा उसका पावन मन एक विचार को जन्म दे रहा था.. एक मेघ की कृष्ण लीला में छिपकर वह प्यारा बताशा बेचैन हो उठा , इस भयंकर बादल की छाँव में परेशान वह कहता है.. कि हे मेघ! तुमने मेरे द्वंद को तल पर ला दिया है , मेरा यह विचार मुझ को प्रश्न का बाण बनकर घायल कर रहा है..   अपनी कालीमा की गंभीरता में पवन के वेग संग उड़ता वह मेघ बोला क्या है वह चंद्र जो तुम्हे व्याकुल कर रहा है ? चंद्रमा संकोच करते हुए कहता है कि क्या मेरा यह सौंदर्य और मेरा यह प्रकाश एक छलावा है ? मनुष्य को कहते सुना है मैं सूर्य के प्रकाश का ऋणी हूँ , तो क्या मेरी यह बताशे की उपमा और पतिव्रताओं का विश्वास मेरा भ्रम तथा एक सांत्वना है ? एक पिता की भाँति अपने पुत्र की इस व्याकुलता से भिग्य महान तेजस्वी सूर्यनारायण कहते है.. यह सत्य है जो तेरा पावन मन तुझसे कहता है , प्रकृति की यही तो अनोखी लीला है! परंतु तू क्यूँ विचलित होता है हे चंद्र! तेरी शीतलता न हो तो मेरी उष्मा की आलोचना यही मनुष्य करता है , मेरी धरा पर अपनी विजय पताका न...