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Showing posts from December, 2013

आत्म रूप

बैठा आसन जमाये कुटी में लगाये ध्यान केंद्र भृकुटी पे .. चला चल एक बिंदु के सहारे  खड़ा अनंत जगत तेरी राह देखे  हो कोई विचार या उद्विग्नता.. अथवा हो कोई भी विघ्न या बाधा  कर विश्वास अटल इष्ट पे, पूर्ण समर्पण  उसकी शक्ति पे.. भय उखाड़ फेंक ह्रदय से .. निरंकार की ज्योत जलती देख कमल पे.. प्रचंड वेग से बढ़ आगे तू , प्रकृति भी हट छोड़े अपना आगे तेरे .. देव हो या कोई भी योनी.. गीत गाएंगे नाम के तेरे आलौकिक होगा दृश्य वह  जब होंगे दर्शन तुझे अपने दिव्य अनंत स्वरूप के |

भ्रमण

कहीं सुदूर प्रदेश में भ्रमण की है तृष्णा मेरी.. जाना हो या अनजाना फर्क कुछ पड़ता नहीं  झोला ले एक रुद्राक्ष की माला.. कुछ मुद्रा हो जेब में और एक पहचान पत्र.. बरसात के लिए हो झोले में एक छत्र, अनंत आकाश की छाया में चल पडूं  रख दृष्टि एक- टक .. न आगा हो न पीछा, दसों दिशाओं में रक्षा करे हर पल  भोले और दिक्पाल .. रहने को स्थान तो मिल ही जाएगा , स्वप्न लोक के ही तो करने हैं दर्शन.. जागृत अवस्था भी लगे स्वप्न, समझ ना आती मेरे ये उलझन .. खोज है समाधान की या अन्तकाल की है  प्रतीक्षा.. अथवा अस्तित्व की ही करनी है समीक्षा .. चलो जो भी हो अकर्मण्यता तो नही है .. भ्रमण ही मेरा है कर्म.. विचारधारा में भ्रमण हो अथवा धरा पर.. भ्रम से होना अग्रसर ही कहलाता है  भ्रमण || 

पार से परे

विकारों को भस्म कर.. आसन लगाया बैठा अपने अन्तस्करण के मसान पर.. शूल और चिमटे को गाड़ चित्त एकाग्रचित, ज्ञान की  धूनी कर प्रज्वल्लित .. पुकारा भोले को शक्ति के संग, उठा वेग चढ़े नेत्र नील आकाश की ओर  खड़ा वह निराकार सामने कहे हूँ मैं ब्रह्म| नहीं माना मैं और दुत्कारा.. तू नहीं वो जो चाहूँ मैं..  नहीं रहा होश अब न सुध ही थी खुद की  घोर से अघोर और काल से महाकाल  सब से परे वह शिव मेरा, करूँ प्रतीक्षा  दे वो कब दर्शन स्व के | परब्रह्म के पार सब में विद्यमान , स्वरुप लिए अनेक परे वह शब्दों और भावनाओं के .. कालातीत हूँ मैं सब कुछ है मेरा कह चल दिया| नमन कर ध्यान सफल हुआ समझ चल दिया संसार की ओर  भोला मैं नाथ को लिए ह्रदय में ||