सफ़र
एक नए सफ़र की तलाश में चल रहा हूँ मंजिल अभी भी धुंध में छिपी है और मैं तो जैसे धुत अंधकार में चल रहा हूँ .. डर तो लगता नहीं न भय शब्द का अर्थ कभी समझने का प्रयास किया| चिंता के समुद्र पर अब भाँती भाँती के विचारों के ज्वार भाटे कुछ अधिक ही क्रीड़ा करने लगे हैं.. पर मैं तो उन ऊँची नीची लहरों पर तैरने का शौक़ीन हूँ .. चिंतन के इस समुद्र मे डूबने का भय अब भी नहीं है अँधेरा तो समुद्र की गहराईयों में भी घात लगाये बैठा है| भाग्य की नौका पर इतराना सही नहीं लगता परन्तु अभिमान करना कैसे छोडू इसलिए अब इस नौका का त्याग कर दिया है | सफ़र तो अभी भी मिला नहीं और उम्मीद मैंने छोड़नी नहीं अँधेरा छँटना नहीं और में रुकना नहीं.. विचारों के भाटे रोकेंगे अवश्य और मैंने रुकना नहीं तैरते जाना है .. तट चाहे मिले न मिले ..तैरते हुए मैंने चलते जाना है चलते जाना है ..|