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Showing posts from September, 2013

चित्त की चिता

मानव जीवन संघर्ष का पर्याय है, अपने देह की पुष्टि तो एक चिंता है ही इसको बन्धनों में बाँध उन सम्बन्धियों का पोषण भी चिंता की पावक में पवन का काम करती है | अपने को समृद्ध बनाने की राह में और अपने चिंन्ह छोड़ जाने की लालसा में हम एक अशांत  तालाब की  भांति हो जाते है | हर क्षण कार्यरत हम प्रकृति के अनुरूप चलते हुए भी खुद को उससे भिन्न मान बैठे हैं | हाँ, यह सही है की मनुष्य की सत्ता प्रकृति के भी परे है परन्तु इसके चलते प्रकृति से द्रोह, गरम सलाख को नंगे हाथों से पकड़ने के समान है | इसी प्रकरण में मेरे मन में विचार उठा की "चिता" क्या है? क्यों आदमी की आखरी सवारी को चिता की संज्ञा दी जाती है? निगमबोध घाट के किनारे  यमुना की गत देखते हुए तथा हर क्षण एक देह भस्म होते देख मैं इस नतीजे पर पहुंचा की  हम जीवन भर 'चित्तवृत्तियों' के अधीन हो कर्म करते रहते है| कुछ विरलों को छोड़ हम सभी का जीवन हमारे चित्त के अनुरूप ही तो चलता है | मन में आनेवाले  विचार चित्त की भूमि में ही तो अंकुरित होते हैं | इसलिए यह कहना की यह चित्त ही मनुष्य का जीवन निर्धारित...

सत् का न्यास

प्रज्वलित है प्रकाश, इस अन्धकार में.. प्रत्यक्ष हो या नहीं वह है बस यही प्रमाण है | असत्य में है निहित सत्य परन्तु सत्य असत्य से है परे .. सत् - असत् में ना फंसो यही विवेक की पुकार है | विशाल है वृत्तियों का वृत्त इनसे जो हुआ विजय वही योगी अलंकृत है.. सन्यास का गीत है  प्रचंड न्यास करो इसका अंग-अंग में ओमकार ही हो ध्वनि या प्रकाश या हो  अन्न  जिसका वह उपभोग करे | वेग है उसकी ज्वाला में जो नेत्र से है उठी अज्ञान की भस्म ओढ़े मेरा वह स्वरुप जिसको मेरा मन कोटि कोटि नमन करे ||

काठ

धधकती हुई अग्नि का स्वर है प्रचंड इसके साथ खेलने में है मेरा मन हमेशा  मग्न .. ज्वलनशील काठ का दृश्य है अनूठा  इसकी केसरी सतह देख प्रेम है मुझे हुआ .. इस देह के अंत में योगदान है इस काठ का भू तत्त्व लिए यह  प्रतिनिधित्व करे संसार का .. भस्म है इसका अंतिम रूप कितना मनोरम है  महाकाल का वस्त्र यह इसका सौभाग्य है | वृक्ष के रूप में मनुष्य का करे जीवन भर कल्याण .. श्मशान में भी उद्धार करे यह काठ मनुष्य का.. इसको है मेरा प्रणाम |

समय

समय को महसूस कर पाने की चाह में कितना समय व्यतीत हुआ पता ही नही चला, घर के एक कोने में  आसन जमा में बैठा, उत्सुकता और सहस से भरा हुआ बेचैन हो गया था| शिला के समान हो जाने का मेरा व्रत समय की धुरी पर टिका था  परन्तु समय से आगे चलने का स्वप्न भी अंकुरित हो रहा था| ज्ञान के भी परे जो काल है उसको देखने का प्रयास था, भूत और भविष्य का विचार तुच्छ सा लग रहा था | देवी-देवताओं के चिंतन से परे हो चली है अब यह धारा, इसी में बहते हुए मैं सब कुछ भुला रहा था.. स्मृति विस्मृत हो नया रूप ले रही थी, वृत्तियाँ  घोर रूप ले प्रत्यक्ष हो रही थी| अभयदान तो मेरे झोले में पड़ा है, इसलिए भय से मुक्त था| इतना कुछ एक साथ हो रहा था समझ नही पा रहा था मैं.. परन्तु धारा के साथ चलना ही उचित है यह कह बुद्धि  ने धीरज बंधाया. अचानक शोर हुआ, समय ने अपना रुदन कर दिया था, आसन त्यागने का समय हो गया था, कुछ ही क्षण हुए थे इस स्थिति में यह जान मैं हैरान था ..समय का खेल है यह देख मेरे ओष्ठ मुस्कराए और मैं चल दिया ||

खोज

अंतर्मन की खोज में दृष्टि अंतर्मुखी हुई मस्तिष्क स्थिर हो चला.. नेत्र को नेत्र न सूझे, दोनों अब एक हो चले  थे | एक विशाल समुद्र मेरे समक्ष गर्जना कर रहा था, पार जाने को ललकार रहा था.. विचार किया यह क्या है, तेरी तृष्णाओं का सागर है, किसी ने समझाया | तैर के  जाऊं  या नाव बनाऊं यह द्वन्द था, पुनः मार्गदर्शन हुआ.. ज्ञान की अग्नि इसको सुखाएगी, यह सुन  मैं  निश्चिन्त हुआ.. भृकुटी के सहारे खोज पे निकला, अन्धकार और प्रकाश से परिपूर्ण यह मार्ग अब भय किंचित मात्र भी न था | खोज ही जीवन है, इसको मैंने अपनाया कुछ पाऊं इस जीवन में या नही, मुझे कुछ सरोकार नहीं ना होगा .. खोज नामक सागर की अनंतता में विलीन हो जाऊं , यही होगी मेरी उपलब्धि ऐसा मैंने निश्चय किया |

STRANGE

The feet are walking clumsy strange that eyes see everything foggy.. wind blows by my ear, sound is blur the eye number three is all i got feeling tired from the fights i fought.. but it is not over yet, more strength is all i want, and strange that's what i always get. strange that i got no wings to fly still i don't touch the grounds, strange that the road is so straight and even strange that we live our lives round and round..

PURITY

Along those thinnest strands, we all walk relation it is and pure love we all want.. what is pure? i do not understand, has many synonyms to explain but takes one heart for it to clasp. basis of it is lust or greed or weak, a debate eternal for thee.. takes just a perception to clarify and a deep glance to feel it. then you are writing words in its glory. a sparkle is enough to give birth to it and spark again to burn it. the strength of it is an illusion do not talk of it, for it lies in your heart heart is meant to be inside, let that creature in purity or sanctity lies within, that we all know yet want it to come out and exhibit!

TIMES

There are times when you just want to sit back cones of past poke you.. but the diverging future soothes you. i shut my eyes tight and feel the vibes vividness is high as if saying 'hi' to skies.. glass of water nourishes me.. fragrance of erudition washes away every ache.. a companion they always seek.. but doesn't even like shadow a loner like me. the light is a betrayer, so is the dark foes are friends that's what old said. but in the end friends turn foes that's what we all see. life is words and words have life finishing this i come back to present only to cherish it as past!

THE STONE

The dark of my pain tries to see the light sometimes i feel i am just a string attached to a kite. a glass of alcohol lures me i want to remain in its essence for the feeling of  lost brings me in its presence the connection is all lost ain't no hurry to find because freedom has got no tag of cost! when i see the stones i can relate with them a mirror i see my reflection in i look inside and see everything except myself where i am? who am i? the question has been haunting for time quite long. i seek answers like mad men.. but so far no success they say answer is within.. Lets see if the stones answer!

मुक्ति से मुक्ति

जीवन को समझने की कोशिश में मुझे एहसास हुआ की अपने जीवन,जो प्रकृति की देन  होते हुए उसके नियमो से आबद्ध है, को इस जगत का एक प्रतिरूप मानते हुए चलना होगा तथा इस विचार से थोडा आगे बढ़ते हुए सोचना होगा की हमारा जीवन जितना रहस्यमयी प्रतीत होता है, यह जगत कोई अपवाद नहीं| इस क्रम में मैंने बहुत से अध्यात्मिक साहित्यों की ख़ाक छानी और जो एक चीज़ निचोड़ के रूप में मेरे सामने बार बार आती थी वह थी यह कुछ पंक्तियाँ  “ मोक्ष इस मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य है”, “जीव का अंतिम गंतव्य यह मोक्ष है” इत्यादि| अलग अलग साहित्यों में इस ‘मोक्ष’ शब्द को भिन्न रूप में पेश किया गया परन्तु मर्म एक ही था और है | मैं इस ‘मोक्ष’ नाम के गंतव्य पर विचार करने लगा| बहुत सी धारणाएं बनी, कल्पना के अथाह सागरों में भी गोते लगाए परन्तु फिर भी कुछ अपूर्ण था| मोक्ष अथवा मुक्ति का विचार आते ही हम एक बंधन से छूटने की परिकल्पना करते है, क्यूंकि बिना बंधन के मुक्ति तर्कहीन है| अगर बंधन नहीं तो मुक्ति किस से ? फिर सोचा की यह बंधन क्या है ? क्या यह संसार ही बंधन है? उपरी तौर पर देखा जाए तो अधिकाँश अध्यात्मिक ...