घाट की पाठशाला


घाट पर खड़ा मै देख रहा था, लोगों को अपनों को ढोए हुए.  कल तक जो जीवंत थे आज मृत की संज्ञा पाए हुए थे..

यमुना का जल मंद गति से बह रहा था मानो उन लोगों के अश्रुओ का प्रतिनिधित्व कर रहा था..                                                                   वायु मे स्थित शान्ति उनके ह्रदय के भारीपन को मानो सहला रही हो .
काठ की चिता बनाना ही एकमात्र कर्म हुआ ,उसकी रचना ही सबसे बड़ा पुण्य थी वहां..

शिव भजन की धुन सूचक थी,मृत अब मुक्त हुआ  परन्तु सत्य से अभी भी हर कोई अनभिग्य था..                                                    चिता की ज्वाला रौद्र हो रही थी अट्टहास था मनुष्य की सान्तता पे परन्तु वह भी शांत हुई ..
सब प्रशंसा ही करने मे थे, मित्र हो या रिपु ,मृत आज वाह-वाही बटोर रहा था,विडंबना कैसी..वह बस इसे सुन न रहा था..

श्मशान का वैराग जीवन का सत्य है, यह अंतिम यात्रा ही इस चोले का लक्ष्य है.. हाड़-मांस का यह देह अब भस्मिकृत हो गया था, परिजनों के नेत्र अभी भी उसे ढूंढ रहे थे, परन्तु वह मृत तो उनकी स्मृति मे सजीव हो चला था..
पंडों के मन्त्र एक विश्वास थे की मृत उर्ध्वगति को प्राप्त हुआ था, कर्म जैसे भी किये हो स्वर्ग ही सबका प्रिय था..

जीवन का सार उस भस्म मे था, मेरा मन ‘ॐ भस्मांगरागाय नमो नमः’ का जाप कर रहा था..
वैराग अपने चरम पर था , आना है यही तो अब कहाँ जाऊँ , गति है हर कर्म की एक , इस सत्य को अपनाऊँ..

समस्त भाव धुँआ हो रहे थे, आकाश मे विलीन होता धूँआ यह कह रहा था , अनंत है तेरी सत्ता अब तो जाग जा ..

मृत्यु के पार का पथ अन्दर स्थित है, इसे श्मशान की गंभीरता शाश्वत कर रही..


घाट की पाठशाला बहुत कुछ सिखा रही थी..!!!

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