चिंतन



विचारों की धारा बह रही थी और नेत्रों के समक्ष  धुंध  छाई हुई थी, किस ओर जाऊं यही द्वन्द चल रहा था|
अपनी सीमाओं के पार चले जाने की वह चिंगारी ज्वाला होने को लालायित थी| चेतना भौतिक धरा से उठ परालौकिक उड़ान भरने को बारम्बार प्रयासरत थी, भविष्य और भूत के दृश्य प्रत्यक्ष हो रहे थे,
क्या सत्य है और क्या भ्रम इसके बीच घमासान युद्ध चल रहा था|
सहसा एक प्रश्न उठा की 'मैं' कौन हूँ? 
और यह सब कौन देख रहा है ? कहा देख रहा है?

इन प्रश्नों ने तो जैसे युद्ध के भीतर एक युद्ध और छेड़ दिया हो| 
पीड़ा से मस्तिष्क का एक-एक अणु विचलित था, परन्तु फिर भी एक आनंद की अनुभूति हो रही थी |
अचानक इन सब के बीच किसी ने मुझे खींचा और एक ओर लाके पटक दिया, और सब कुछ शांत हो गया|
पुनः इस लोक का प्रकाश देख मैं स्तब्ध रह गया|
शायद मेरा चिंतन भंग हो गया, यात्रा पुनः आरम्भ करने की प्रेरणा मिली परन्तु समय धोखा दे गया !

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