इह लोक के पार

चलो चलें कहा उसने..
पूछा मैंने अब कहाँ?
वहीँ जहाँ इह लोक की खिट-पिट ना हो
न हो कोई सवेरा, जिसमे होकर तंग पड़े उठना ..
ना ही हो ऐसी काली रात, जिसमे अंध दृष्ट होकर पड़े चलना..
ऐसा कौन  सा लोक है यह सोचा मैंने और लगा घोर मंथन में ..

उसने कहा अचानक की वह लोक है बड़ा निराला
मत हो परेशां वहां मिलेगा तुझे एक ऐसा प्याला ..
पीकर जिसे ख़त्म होगी उलझन सारी तेरी..
मिलेगी ऐसी खाट जिस पर सोना होगा मानो योग निद्रा
मिट जाएगी थकान सारी, सुकून मिलेगा तुझे ऐसा |
मेरा मंथन गहराता चला गया की क्या है ऐसी भी कोई दुनिया?
फिर क्यों तेल के पीछे जंग लड़ रहे हम.. लड़ रहे भू अधिग्रहण पर जब मिलनी ज़मीन दो गज ही है ..
लगाओ दौड़ इस लोक तक की
परन्तु फिर भी पहुचें प्रथम कौन ..?
विवाद नहीं रहेंगे कोई गर जो यहाँ पहुँच गए हम तो.. ऐसा कहा कान में मेरे उसने
तो चल पड़ा उसके संग इस लोक के दर्शन हेतु ..

पर मंथन अभी ख़त्म हुआ नही था ..
है कौन जो यह रहस्य बताए अनूठे ?
तभी सहसा उठा निद्रा से
और पहेली सब सुलझ गयी..!

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