सात द्वार

बैठा मैं आसन लगा धरा पर
और ऊपर नीला आकाश
मेरु ताने ऊपर की ओर श्वास लूँ मंद मंद कर बंद आँख..
युद्ध फिर हुआ शुरू एक घमासान,
जिसमे था मैं एक तरफ 
और एक तरफ थे ये असंख्य विचार|

इनको तूल ना दे, ना हो इनसे परेशान..
बोली अंतर की ध्वनि कि  
आने दे इनको निरंतर और खड़ा रह तू  नदी में शिला समान
बहाव इनका देगा तुझे रूप एक 
जिस से है तू अभी अनजान|

आदेश छुपे उस वाणी में, कैसे इसको मैं टालता 
ध्यान दिया न उन पे और रमा लिया खुद को उस इश्वर पे
जो है एक मात्र सत्य शाश्वत मार्ग..
उठा सवाल एक ऐसा जिसपे मैं था अब अड़ गया
क्या गति है इस ध्यान की जिसे करने हूँ मैं अभी बैठा?
बोली वह वाणी पुनः आदेश रूप में 
द्वार सात इस ध्यान के
तथा लम्बी है यात्रा इस आत्मज्ञान की 
चल इस पथ पर बिना विचलित हुए..

करे जो तू सातों द्वार पार
दिखेगा एक परम बिंदु तुझे 
और स्थिर करे जो तू ध्यान उस पर अपना 
एकाकार हो तेरा उस ज्ञान से 
जिसे हर मानव इस धरा पर 
खोजे निरंतर भटकते हुए |

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