मदिरा का प्याला

मदिरा के प्याले को घूरते हुए
बीत गया न जाने समय कितना
पीना भी था उसको इसका भी होश न रहा..
प्याला होंठों से लगाने को मचल रहा था मन
परन्तु नज़र तो बस देखने में ही मग्न थी..
हाथों को जैसे जकड़ लिया था मेरे
कैसा विचित्र जादू था उस मदिरा का
की अपने पास आने ही न दिया ..
देख देख उसको थक रहा था मैं
परन्तु खुशबू उसकी पुनः ताज़ा कर दे रही थी |

कितना प्रयत्न किया की प्याला उठा लूँ..
परन्तु प्याले में मदिरा रुपी विराजी उस देवी ने
जैसे वशीभूत किया हुआ था ..
चन्द्र की प्रभा में कैसे चमक रहे थे मदिरा की उस देवी के वे विचित्र नेत्र
मैं तो बावरा सा हो रहा था उसके मौन प्रेम में की तभी ..

की तभी मेरा वह प्यारा प्याला छलका..
मानो एक इशारा हुआ..
शीशे का वह हीरे की तरह चमकता प्याला
चंद्रप्रभा का एक अद्भुत प्रतीबिम्ब दिखा रहा था ..
उस बिम्ब को घूरता मैं उसमे डूबता ही जा रहा था
की अचानक सब कुछ शांत हो गया ..
सारी हलचल नशे की तरह अपने आप में ही डूबती चली गयी
और फिर मेरी समझ में आया

की प्याला तो सूख गया..
मदिरा की देवी वरदान दे गयी थी ..!!

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