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II सरोवर: तेरे विचार का II

नेत्र मूंदे-मूंदे मैं ले रहा था श्वास धीमे धीमे , किचेतना का सफ़र शुरू हुआ उर्ध्वगामी हौले हौले.. अभी तो मैं हृदय सरोवर के समीप पहुँचा ही था , कि मेरे मन ने आवाज़ लगाई भीतर इसके मत जा.. मैं हुआ आशंकित कि है कि है तो नही ये कोई परीक्षा ? अवश्य है कोई रहस्य इस सरोवर का.. मैने निर्णय लिया देखूं सरोवर में आख़िर है क्या ? करेगा मानव वही जो है किया गया उसको मना.. थोड़ा दम भरकर और लेकर ईश्वर का नाम , आगे बड़ा मैं निकट देखा पत्थर पर लिखित उस सरोवर का नाम.. लिखा था ' तेरे विचार ', पढ़कर हुआ मैं हैरान.. किया प्रश्न उस आवाज़ से क्या विचार है जल समान ? जन्म-जन्मान्तर के विचार और मेरी भावनाओं ने मिलकर लिया है रूप सरोवर का , दिखे मनोहर परंतु माना है भीतर जाना! ज्ञान की अग्नि ने जटिलता से सूखाया है मेरी अज्ञान से गीले अंतःकरण को , तो क्यूँ निष्फल करूँ मैं उस महान ज्वाला के दैविक कर्म को ? प्रणाम किया उस वाणी को जिसने मुझे चेताया था , आभार प्रकट किया कि दिशा दी मेरी बुद्धि को और डूबने न दिया उस सरोवर में , जिसका नाम था.. सरोवर: तेरे विचार क...