II सरोवर: तेरे विचार का II
नेत्र मूंदे-मूंदे मैं ले
रहा था श्वास धीमे धीमे,
किचेतना का सफ़र शुरू हुआ
उर्ध्वगामी हौले हौले..
अभी तो मैं हृदय सरोवर के
समीप पहुँचा ही था,
कि मेरे मन ने आवाज़ लगाई
भीतर इसके मत जा..
मैं हुआ आशंकित कि है कि
है तो नही ये कोई परीक्षा?
अवश्य है कोई रहस्य इस
सरोवर का..
मैने निर्णय लिया देखूं
सरोवर में आख़िर है क्या?
करेगा मानव वही जो है
किया गया उसको मना..
थोड़ा दम भरकर और लेकर
ईश्वर का नाम,
आगे बड़ा मैं निकट देखा
पत्थर पर लिखित उस सरोवर का नाम..
लिखा था ' तेरे विचार', पढ़कर हुआ मैं हैरान..
किया प्रश्न उस आवाज़ से
क्या विचार है जल समान?
जन्म-जन्मान्तर के विचार
और मेरी भावनाओं ने मिलकर लिया है रूप सरोवर का,
दिखे मनोहर परंतु माना है
भीतर जाना!
ज्ञान की अग्नि ने जटिलता
से सूखाया है मेरी अज्ञान से गीले अंतःकरण को,
तो क्यूँ निष्फल करूँ मैं
उस महान ज्वाला के दैविक कर्म को?
प्रणाम किया उस वाणी को
जिसने मुझे चेताया था,
आभार प्रकट किया कि दिशा
दी मेरी बुद्धि को और डूबने न दिया उस सरोवर में,
जिसका नाम था.. सरोवर:
तेरे विचार का..
तेरे विचार का..
-- कार्तिकेय अवस्थी
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