आगे बढता गया..
आध्यात्म के समुद्र के निकट खड़ा मैं उसे निहार रहा था
भौतिकता की रेत नरम सी महसूस हो रही थी परन्तु
मेरा मन समुद्र के शोर मे रमता चला गया. मैंने आगे बढ़ने का निर्णय किया कि तभी
पीछे से लोगो ने पुकारा “ आगे न जा, जल है
गहरा ”
मैंने समुद्र की ओर देखा, कितना शांत और सांत प्रतीत हुआ, मैं हँसा और आगे
बढ़ा.. लोग फिर बोले सोचले दोबारा परन्तु
समुद्र की शांति मे वह शोर दबता चला गया..
समुद्र का जल मेरे पैरों को धोने लगा और इधर
भौतिकता की रेत जिद्दी होती गई, गीले पैरों में वह और चिपकती चली गई. परन्तु मैं
परेशान न हुआ और आगे बढता
चला गया..
अचानक लहरें उठी, वातावरण बदला, मैं फिसला और रेत के एक ढेर पर जा गिरा परन्तु
दृष्टि केवल समुद्र पर थी.. मानो वह भी मुझे देख हंस रहा हो.. उसमे उठी ज़ोरदार
लहरें उसका अट्टहास ही तो थी.. मैं भी मुस्कराया और एक बार फिर आगे बढ़ा..
जैसे जैसे आगे बढता समुद्र भयावह रूप से गर्जना करता, विचलित हुए बिना मैं
आगे बढता गया ..
कानो मे आवाज़ पड़ी , वही लोग पुनः चेता रहे थे परन्तु अब तो इस जल को पीना ही
था , मैं बिना चखे ही मदमस्त हो रहा था. मैं किनारे तक पहुंचा और स्थिर हो उस
समुद्र को देखता रहा कि तभी एक विरक्ति की लहर ने मुझे पकड़ लिया.
आँख खुली तो किनारा न था, जहाँ दृष्टि पड़े केवल जल था. दिशा का भान न हो पाया क्यूंकि
भानु आकाश मे ही न था..
अपनी दाई ओर देखा और एक बार फिर आगे बढ़ा..
मैं वस्त्रहीन था .. मानो समुद्र रुपी उस माँ ने मुझ नवजात को अपनी गोद में
संभाला हुआ था.. ज्ञान की ममता के आनंद मे मैं आगे बढता गया..
पहले सांत प्रतीत हुआ समुद्र अब अनंत था. ज्ञान का यह पहला पाठ मैं समझ गया था
किनारे की अपेक्षा किये बिना मैं आगे बढता चला गया, आगे बढता चला गया और अब
भी आगे बढ़ रहा हूँ !!
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