परोपकार का विचार



मुख पर देख प्रचंड ज्वाला
मन्त्र मुग्ध मैं हुआ .
किसी तंत्र से भी परे यह
घोर तेज उस कपाल का |

स्त्रोत की स्तुति करू या वेदों
का यज्ञ ही ?
न सूझे मेरे मन को कुछ स्तंभित हुई चेतना मेरी|

उच्चाट हुआ संसार से मैं,
संबंधो से विद्वेषण हुआ|
अहंकार का मारण कर उस ज्ञान ने
मुझे दिया कुछ विशिष्ट है..
कपोल कल्पना के परे वह विशिष्ट,
यदि है ,
तो है शब्दों से भी परे,
बुद्धि भी माने हार आगे उसके
ऐसी अवस्था वह है|

लोक कल्याण की अग्नि को भोग लगा है स्वार्थ का,
परोपकार का भाव ही है एक मात्र उपाय मुक्ति का
यह विचार ही प्रफुल्लित करे,
और दे मार्ग आगे का ||

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