संकल्प




किसी भी कार्य को निष्काम भाव से करने का निश्चय जितना सुनने मे आसान लगता है
व्यवहार में उतना है नहीं|
आध्यात्मिक  पथ पर तो यदा-कदा सुनने में आता ही रहता है की अपनी साधना को निष्कामी होकर करो|
साधारण पूजा का संकल्प ही आदमी को सोच में डूबा देता है की अमुक शक्ति की आराधना किस हेतु करू?
आरोग्य जीवन, दीर्घायु अथवा धन -संपत्ति ?
आज के समय में ये तो हर पूजा में संकल्प विद्यमान होता ही है |
तो क्या साधू महात्माओं के संकल्प इससे भिन्न होते हैं  ?
इस पर टिपण्णी करना उचित नहीं क्यूंकि कुछ वर्ग भोग से मुक्ति की ओर जाते है
तो वही कुछ ऐसे भी है जो स्वयं के लिए तो कोई संकल्प ही नही उठाते, उनके फूल-अक्षत तो परोपकार के लिए ही समर्पित हो जाते है |
ब्रह्मोपासना  में भी सकाम और निष्काम आराधना की चर्चा आती है, खैर वह एक अलग विषय है,
यहाँ बात आम जीवन की है| जिस ओर कृष्ण ने फल की चिंता ना करते हुए कर्म करने का ज्ञान दिया है वह 
ज्ञान हमें न सिर्फ अपने व्यवहारिक जीवन में उतारना चाहिए अपितु अपनी नित्य साधनाओं में भी|
साधना पूजा आदि करते हुए भी हम कर्म ही तो करते है | 

तो फिर साधना-आराधना की उस पवित्रता को अपनी स्थूल कामनाओं से मलिन क्यों करना?
विचार कीजिये !!

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