पार से परे



विकारों को भस्म कर..
आसन लगाया बैठा अपने अन्तस्करण के मसान पर..
शूल और चिमटे को गाड़ चित्त एकाग्रचित, ज्ञान की 
धूनी कर प्रज्वल्लित ..

पुकारा भोले को शक्ति के संग, उठा वेग
चढ़े नेत्र नील आकाश की ओर 
खड़ा वह निराकार सामने कहे हूँ मैं ब्रह्म|
नहीं माना मैं और दुत्कारा..
तू नहीं वो जो चाहूँ मैं.. 

नहीं रहा होश अब न सुध ही थी खुद की 
घोर से अघोर और काल से महाकाल 
सब से परे वह शिव मेरा, करूँ प्रतीक्षा 
दे वो कब दर्शन स्व के |

परब्रह्म के पार सब में विद्यमान ,
स्वरुप लिए अनेक परे वह शब्दों और भावनाओं के ..
कालातीत हूँ मैं सब कुछ है मेरा कह चल दिया|
नमन कर ध्यान सफल हुआ समझ चल दिया संसार की ओर 
भोला मैं नाथ को लिए ह्रदय में ||

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