भ्रमण




कहीं सुदूर प्रदेश में भ्रमण की है तृष्णा मेरी..
जाना हो या अनजाना फर्क कुछ पड़ता नहीं 
झोला ले एक रुद्राक्ष की माला..
कुछ मुद्रा हो जेब में और एक पहचान पत्र..
बरसात के लिए हो झोले में एक छत्र,
अनंत आकाश की छाया में चल पडूं 
रख दृष्टि एक- टक ..

न आगा हो न पीछा, दसों दिशाओं में रक्षा करे
हर पल  भोले और दिक्पाल ..
रहने को स्थान तो मिल ही जाएगा ,
स्वप्न लोक के ही तो करने हैं दर्शन..
जागृत अवस्था भी लगे स्वप्न,
समझ ना आती मेरे ये उलझन ..
खोज है समाधान की या अन्तकाल की है 
प्रतीक्षा..
अथवा अस्तित्व की ही करनी है समीक्षा ..

चलो जो भी हो अकर्मण्यता तो नही है ..
भ्रमण ही मेरा है कर्म..
विचारधारा में भ्रमण हो अथवा धरा पर..

भ्रम से होना अग्रसर ही कहलाता है  भ्रमण || 

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