राह के साथी .

राह का बिना लगाये पता
चलना चाहता हूँ मैं ,
जग का कोई भय हूँ नहीं मैं जानता ..
भय तो कभी शायद बचपन में सिखाया गया था
पर मैं ठहरा जिद्दी सीख कभी ना पाया |

लोग खोजते रहते है राहें
राह उन्हें है खोज रही
ना जाने क्यों न वे समझते ..
फिर खोजें एक साथी जो दे हर पथ साथ उनका,
इस धोखे में वह जीवन का मूल ही खो बैठते ..

साथी की उपेक्षा हूँ नहीं मैं कर रहा..
साथी हो वो जिसे तुम्हे ना पड़े खोजना |
मिल जाएँगे ऐसे अनेक जो चल रहे राह तुम्हारी,
परन्तु प्रेम बांधेगा दो उन्ही को जिन्हें जग कह सके 
'भई ! ये तो हैं अनूठे ..'

तो होते क्यों हो परेशां इस खोज के मायाजाल से..
धरो ह्रदय में विश्वास और चल पड़ो उसी को अपना
हमसफ़र बनाके !!

Comments

Popular posts from this blog

भीड़

GROWN UP

Camera For Imagination