डूबता चला गया.. |

मद में खो जाने को मचलने लगा है मन
परन्तु उसके प्रेम के आगे संसार का प्रेम भी पड़ जाता है सुन्न ..

चला ही था मैं मधुशाला की ओर की कदम लड़खड़ाने लगे
अजीब सी शान्ति लिए मन ,हो रहे थे मेरे होश ठगे ठगे ..
चाहता था एक पल को दृड़ हो चल पडूं लक्ष्य की ओर
परन्तु चेहरा चंद्रमुख सा आये सामने तेरा और फिर
ह्रदय करने लगे शोर..

ये हो रहा था बेचैन और बेचारा महसूस कर रहा था एक प्यारा  बंध..
तेरे उन नशीले नेत्रों ने चला जो रखे  थे अपने मधुर प्रेम मन्त्र !
बेचैनी में भी एक अलग शांति मानो हूँ खड़ा प्रेम के सागर तट पर
ज्वार और भाटे उठे जैसे वाणी का उद्गार हो तेरे मुख पर
उस प्रेम सागर के जल के छींटे भिगो रहे थे मुझे
प्रयास हो मानो अपने में समा लेने का !
इस सागर में डूबने को तो हर प्राणी है तत्पर,
भला मैं कैसे पीछे रहता..

जाम अभी गले से उतर ही रहा था की नशा चरम पे आने लगा
और मैं तूफ़ान की लहरों की तरह लहरा रहे तेरे इन केशों में डूबता चला गया
डूबता चला गया ..

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