II आनंद स्वरूप II
संसार को समझने निकला है तू ओ मानव!
कैसी विडंबना है की तू न समझ पाया अपने ही दानव..
कण कण में व्याप्त है तेरे यह संसार,
इस सत्य का कर तो ज़रा सा अपनी बुद्धि में संचार..
ना लगेगी घी की बाती और ना ही लगेगा कोई पुष्प या फ़ूल,
गर तू जगा दे हृदय में अलख निरंजन और कर दे
सहस्त्रदल कमल चैतन्य..
चाहिए केवल एक चिंगारी हर वाहन के ईंधन को,
उसकी कृपा और तेरा अटल विश्वास ही है वह शोला जो जगा दे ज्ञान की ज्वाला को..
अज्ञान में खूब खाली तूने ठोकर अब तो कुछ संभल जा ,
तोड़ दे बंधन और आडंबर , पकड़ ले उस सत् को जो तेरे चित्त में है बैठा बनकर
आनंद स्वरूप ..
बनकर आनंद स्वरूप.
Comments
Post a Comment