II चंद्र का चंचल प्रश्न I
पूर्णिमा कि रात्रि में जब चंद्रमा अपने रूप पर इठला रहा था,
तो सहसा उसका पावन मन एक विचार को जन्म दे रहा था..
एक मेघ की कृष्ण लीला में छिपकर वह प्यारा बताशा बेचैन हो उठा,
इस भयंकर बादल की छाँव में परेशान वह कहता है..
कि हे मेघ! तुमने मेरे द्वंद को तल पर ला दिया है,
मेरा यह विचार मुझ को प्रश्न का बाण बनकर घायल कर रहा है..
अपनी कालीमा की गंभीरता में पवन के वेग संग उड़ता वह मेघ बोला क्या है वह चंद्र जो तुम्हे व्याकुल कर रहा है?
चंद्रमा संकोच करते हुए कहता है कि क्या मेरा यह सौंदर्य और मेरा यह प्रकाश एक छलावा है?
मनुष्य को कहते सुना है मैं सूर्य के प्रकाश का ऋणी हूँ,
तो क्या मेरी यह बताशे की उपमा और पतिव्रताओं का विश्वास मेरा भ्रम तथा एक सांत्वना है?
एक पिता की भाँति अपने पुत्र की इस व्याकुलता से भिग्य महान तेजस्वी सूर्यनारायण कहते है..
यह सत्य है जो तेरा पावन मन तुझसे कहता है,
प्रकृति की यही तो अनोखी लीला है!
परंतु तू क्यूँ विचलित होता है हे चंद्र!
तेरी शीतलता न हो तो मेरी उष्मा की आलोचना यही मनुष्य करता है,
मेरी धरा पर अपनी विजय पताका न लहरा पाएगा यह मनुष्य कभी,
इसी लिए तो अपनी अंतरिक्ष यात्रा पर गर्व तेरा उदाहरण देकर करता है..
रात्रि में जब प्रकृति मेरा प्रकाश हर लेती है मुझसे,
तो वही तेज शीतल किरणों में परिवर्तित
तुझे देकर तेरा मान उँचा करती है..
तेरा मान उँचा करती है..
-- कार्तिकेय अवस्थी
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