क्रोध की शांति
अंतर्मन मे झांका तो अलग ही रूप दिखा ..
प्रकृति के प्रति प्रेम के संग एक विरोधाभास भी था |
रचनात्मकता के साथ साथ विध्वंसता भी व्याप्त थी..
उत्पन्न हुई हर वस्तु का नाश सदा निर्धारित , ये एक सत्य है |
क्रोध की इस प्रचंड ज्वाला मे जलना एक अलग आनंद है ..
हर तरफ इस ज्वाला को फैलाना मानो मेरा कर्म हो |
इस चक्र का आरंभ भी अग्नि से है तो इसका अंत भी अग्नि से ही होगा ..
इस सत्य को स्वयं मे धधकते हुए देखना परमानन्द है |
वातावरण मे व्याप्त शांति को देख एक सूक्ष्म प्रतिक्रिया होती है..
इस शांति को नष्ट करने का मन होता है |
सोचा शांति समाधी का प्रतिरूप है ..
परन्तु क्रोध की अग्नि मे स्वयं की आहुति भी एक परम सिद्धि ही है |
महाकाल क्रोध के पर्यायी है ..
परन्तु दक्षिण-मूर्ति के शांत रूप मे वे ज्ञान का प्रतिरूप है |
ऐसे क्रोध विज्ञानं मे खो जाना ही एक अभिलाषा अब शेष है ||
क्रोध की शांति मे समाधिष्ट होना भी एक परम योग है ..|
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