आकाश
विशाल आकाश को देख
मन मे आया विचार.. है यह कोई कल्पना
या कोई स्वप्न सत्य साकार |
भिन्न भिन्न आकारों को निहारते
नेत्र कभी थकते नहीं
देखता जाऊ इन्हें क्युकी हर्षित होता मेरा मन |
वर्तमान चलचित्र से बेहतर है यह अनंत पर्दा आकाश का
न जाने क्यों न समझता यह बात मानव इस काल का |
दार्शनिक जन करें वार्तालाप उस अनंत की..
परन्तु शिकायत करे की वह है नही दिखता
फिर भी विद्यमान है..
मै कहता हू अरे मूर्ख ! चड़ा नेत्र आकाश मे |
तत्वों मे सर्वोपरि आकाश है
प्राणों का प्रिय, भौतिक से दूर उस अधर्मी से सदा निराश है |
अग्नि देखे सदा इसका मुख क्रोध मे
भयभीत आकाश रो दे और टपक पड़े आंसू इसके
उस अग्नि को शांत करने |
आकाश को देखा तो यह विचार आया
विचारो को अभिव्यक्त करू
यह प्रेरणा मै लाया !!
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