काल



काल है चंड देगा दण्ड प्रचंड
गर करो विचार ज्ञान इसका है  अनंत |

सभी मे छुपा काल है  फिर भी कुछ है नही छुपा
अदृश्य भी दृश्य हो जो  काल हो अड़ खड़ा |

राम हो या  कृष्ण कोई नही है बचा
स्वयं काल ही काल खाए यह विचित्र नाट्य इसने है रचा |

देश से है काल अथवा काल से है यह देश
मनुष्य है सांत या है साकार ईश्वरीय रूप अनंत
अंतिरक्ष की सूक्ष्मता मे विलीन है ऐसे विचार धारा में  मग्न |

ऋषि के ध्यान को नापता यह काल
सर्वोपरि दिखा इसलिए शिव बना महाकाल |

काल की अनुभूति होती, होती  उस भूमि पे जिसका नाम है श्मशान
चिता की ज्वाला मे अट्टहास उसका मंद मंद |

घोर है ये काल परन्तु इसके भगत कहलाते है अघोर
फिर भी घोर-अघोर के द्वन्द से परे यह काल विद्यमान है हर ओर |

कोटि कोटि नमन इस काल को जो प्रतीत हो भिन्न भिन्न
मैं  ही हूँ यह काल..समझ गया अब की हूँ नही अभिन्न |

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