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Showing posts from January, 2014

चलता रहा

देखते ही देखते मैं इस दिशा की ओर चल पड़ा कोई रूप रेखा थी नही मार्ग अनजान चुन लिया.. मोड़ अनजाने आते गये मैं उनके संग मुड़ता गया जहां मुझे जाना था.. उस गंतव्य का भान होते हुए भी न था परन्तु आत्मविश्वास की पूंजी लिए मैं निरंतर चलता रहा। अनेकों विचार रूप वीभत्स लिए समक्ष मेरे आ खड़े हुए उनसे निडर प्रभाव से उनके निर्पेक्ष हो मैं जिद्दी सा चलता रहा। पत्थर से अपने ह्रदय का बोझ अब बोझ ना लगता था आदी जो हो गया था मैं अब उस वज़न का.. थोड़ा ही आगे तक मैं चला था की मुख पर एक ऊष्मा का एहसास हुआ.. चलते चलते कब यह बोझ अश्रु बनकर बहने लगा यह तो मुझे पता ही न चला। दिन से रात और फिर मौसम निरंतर प्रकृति रूप बदलतीं गयी.. बदला नही जो था वह मेरा विश्वास अपने चुने मार्ग पर और मैं चलता गया चलता गया और अब भी चल रहा हूँ..।

अंधकार

अंधकार में नेत्र गड़ाकर देखने का प्रयास था… ना जाने क्या सूझी परन्तु  कुछ तो देखने की आस थी सहसा कुछ प्रतीत हुआ पत्थर की भाँती नेत्र एक ओर टिक गये हलचल सारी रुक गयी और विचार सब थम गये अगले कुछ क्षण तक काल का बोध न रहा ठंडी हवा का झोंका नेत्र शुष्क कर गया अश्रु फिर भी ना आने पाए ह्रदय में ही कैद हो ऐसा मानो उन्हें दंड था.. धुत अंधकार अब प्रकाशमय प्रतीत हो रहा था श्वेत प्रकाश कण मेरे आगे नृत्य कर रहे थे उन्हें देख मैं अपनी सुध खो रहा था.. की तभी आत्म चिंतन का विचार आया शुष्क पड़े नेत्र अब मेरे ह्रदय की गहराई नाप रहे थे इतना अंधकार देख मैं हैरान रह गया.. परन्तु प्रकाश वही छुपा मुस्कुरा रहा था मानो दिलासा दे रहा हो की मैं हूँ शांत रह उद्विग्न ना हो एक छोटा सा आश्वासन ही बहुत था मैं  प्रसन्न हो गया सोचा अब क्या घबराना  .. और पुनः अन्धकार में शांति खोजने लगा।

पक्षी और मैं

उड़ते पक्षी के पंजे को देख नज़र अपनी हथेली पर गयी, धूल लगी हर उस धरती की जहाँ उसने की भोजन की खोज.. मैं तांकू उस रेखा को जो दिखाए हैं जाना अब मुझे कहाँ .. हवा में तैरते उसके पंख करते है नाद उसके हौसलों का.. मैं तांकू कोई शख्स जो दिलाये याद मैं करने में हूँ सक्षम ना जाने क्या-क्या! हर क्षण दिशा पलटते नेत्र उसके.. दिलाएं स्मरण मुझे मेरे मन का .. है कितनी समानता उस पक्षी और मुझ में यह बात करती नही हैरान.. क्यूंकि  जानता हूँ अगर उड़ सकता है वो तो मैं तो उसको उड़ाना जानता हूँ!