चलता रहा

देखते ही देखते मैं इस दिशा की ओर चल पड़ा
कोई रूप रेखा थी नही मार्ग अनजान चुन लिया..
मोड़ अनजाने आते गये मैं उनके संग मुड़ता गया
जहां मुझे जाना था.. उस गंतव्य का भान होते हुए
भी न था परन्तु आत्मविश्वास की पूंजी लिए मैं निरंतर
चलता रहा।

अनेकों विचार रूप वीभत्स लिए समक्ष मेरे आ खड़े हुए
उनसे निडर प्रभाव से उनके निर्पेक्ष हो
मैं जिद्दी सा चलता रहा।

पत्थर से अपने ह्रदय का बोझ अब बोझ ना लगता था
आदी जो हो गया था मैं अब उस वज़न का..
थोड़ा ही आगे तक मैं चला था की मुख पर एक ऊष्मा का एहसास हुआ..
चलते चलते कब यह बोझ अश्रु बनकर बहने लगा
यह तो मुझे पता ही न चला।
दिन से रात और फिर मौसम निरंतर प्रकृति रूप बदलतीं
गयी..
बदला नही जो था वह मेरा विश्वास अपने चुने मार्ग पर और
मैं चलता गया
चलता गया
और अब भी चल रहा हूँ..।

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