अंधकार



अंधकार में नेत्र गड़ाकर देखने का प्रयास था…
ना जाने क्या सूझी परन्तु  कुछ तो देखने की आस थी
सहसा कुछ प्रतीत हुआ
पत्थर की भाँती नेत्र एक ओर टिक गये
हलचल सारी रुक गयी
और विचार सब थम गये

अगले कुछ क्षण तक काल का बोध न रहा
ठंडी हवा का झोंका नेत्र शुष्क कर गया
अश्रु फिर भी ना आने पाए
ह्रदय में ही कैद हो ऐसा मानो उन्हें दंड था..
धुत अंधकार अब प्रकाशमय प्रतीत हो रहा था
श्वेत प्रकाश कण मेरे आगे नृत्य कर रहे थे
उन्हें देख मैं अपनी सुध खो रहा था..

की तभी आत्म चिंतन का विचार आया
शुष्क पड़े नेत्र अब मेरे ह्रदय की गहराई नाप रहे थे
इतना अंधकार देख मैं हैरान रह गया..
परन्तु प्रकाश वही छुपा मुस्कुरा रहा था
मानो दिलासा दे रहा हो की मैं हूँ
शांत रह उद्विग्न ना हो
एक छोटा सा आश्वासन ही बहुत था
मैं  प्रसन्न हो गया सोचा
अब क्या घबराना  ..
और पुनः अन्धकार में
शांति खोजने लगा।

Comments

Popular posts from this blog

HAPPINESS

THE PATH

Fiery Love Flame.