खोज



अंतर्मन की खोज में दृष्टि अंतर्मुखी हुई
मस्तिष्क स्थिर हो चला..

नेत्र को नेत्र न सूझे,
दोनों अब एक हो चले  थे |

एक विशाल समुद्र मेरे समक्ष गर्जना कर रहा था,
पार जाने को ललकार रहा था..
विचार किया यह क्या है,
तेरी तृष्णाओं का सागर है, किसी ने समझाया |

तैर के  जाऊं  या नाव बनाऊं यह द्वन्द था,
पुनः मार्गदर्शन हुआ..
ज्ञान की अग्नि इसको सुखाएगी,
यह सुन  मैं  निश्चिन्त हुआ..

भृकुटी के सहारे खोज पे निकला,
अन्धकार और प्रकाश से परिपूर्ण यह मार्ग
अब भय किंचित मात्र भी न था |

खोज ही जीवन है, इसको मैंने अपनाया
कुछ पाऊं इस जीवन में या नही,
मुझे कुछ सरोकार नहीं ना होगा ..

खोज नामक सागर की अनंतता में विलीन हो जाऊं ,
यही होगी मेरी उपलब्धि
ऐसा मैंने निश्चय किया |

Comments

Popular posts from this blog

भीड़

GROWN UP

Camera For Imagination