सत् का न्यास
प्रज्वलित है प्रकाश,
इस अन्धकार में..
प्रत्यक्ष हो या नहीं
वह है बस यही प्रमाण है |
असत्य में है निहित सत्य परन्तु सत्य असत्य से है परे ..
सत् - असत् में ना फंसो यही विवेक की पुकार है |
विशाल है वृत्तियों का वृत्त
इनसे जो हुआ विजय वही योगी अलंकृत है..
सन्यास का गीत है प्रचंड
न्यास करो इसका अंग-अंग में
ओमकार ही हो ध्वनि या प्रकाश या हो अन्न जिसका वह उपभोग करे |
वेग है उसकी ज्वाला में जो नेत्र से है उठी
अज्ञान की भस्म ओढ़े मेरा वह स्वरुप
जिसको मेरा मन कोटि कोटि नमन करे ||
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