मुक्ति से मुक्ति
जीवन को समझने की कोशिश में मुझे एहसास हुआ की अपने जीवन,जो प्रकृति की
देन होते हुए उसके नियमो से आबद्ध है, को इस
जगत का एक प्रतिरूप मानते हुए चलना होगा तथा इस विचार से थोडा आगे बढ़ते हुए सोचना
होगा की हमारा जीवन जितना रहस्यमयी प्रतीत होता है, यह जगत कोई अपवाद नहीं|
इस क्रम में मैंने बहुत से अध्यात्मिक साहित्यों की ख़ाक छानी और जो एक चीज़
निचोड़ के रूप में मेरे सामने बार बार आती थी वह थी यह कुछ पंक्तियाँ “ मोक्ष इस मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य है”, “जीव
का अंतिम गंतव्य यह मोक्ष है” इत्यादि| अलग अलग साहित्यों में इस ‘मोक्ष’ शब्द को
भिन्न रूप में पेश किया गया परन्तु मर्म एक ही था और है |
मैं इस ‘मोक्ष’ नाम के गंतव्य पर विचार करने लगा| बहुत सी धारणाएं बनी, कल्पना
के अथाह सागरों में भी गोते लगाए परन्तु फिर भी कुछ अपूर्ण था|
मोक्ष अथवा मुक्ति का विचार आते ही हम एक बंधन से छूटने की परिकल्पना करते है,
क्यूंकि बिना बंधन के मुक्ति तर्कहीन है| अगर बंधन नहीं तो मुक्ति किस से ? फिर सोचा
की यह बंधन क्या है ? क्या यह संसार ही बंधन है? उपरी तौर पर देखा जाए तो अधिकाँश
अध्यात्मिक साहित्य संसार को बंधन की ही संज्ञा देता है परन्तु वहीँ श्रीकृष्ण ने
तो इस संसार को एक कर्मभूमि के रूप में रखकर अध्यात्म जगत को एक अलग ही आयाम दे दिया|
कर्मयोग के द्वारा उन्होंने सांसारिक बंधन को एक बंधन ही कहाँ रहने दिया ! अपितु यह
भूमि तो एक गंभीर योगी के लिए बंधन न रहकर एक साधना का पथ हो गयी|
जिस प्रकार एक अघोरी के लिए श्मशान ही साधना स्थल है और फिर वह इस संसार को ही
एक विशाल श्मशान के रूप में देखता हुआ विचरण करता है उसी प्रकार एक साधारण साधक को
भी इस स्थिति प्राप्त करने के लिए अग्रसर रहना चाहिए | जैसे कमल का फूल कीचड़ में होते हुए
भी अपने वास्तविक स्वरुप से जुड़ा रहता है वही हमें भी करना है|
तब न तो यह संसार रहेगा न कोई बंधन न ही मुक्ति |
क्यूंकि बंधन से मुक्ति अपने आप में एक विरोधाभास है और एक द्वन्द प्रतीत होते
हुए एक ऐसी स्थिति का भ्रम उत्पन्न करता है जो मात्र मरुस्थल में स्थित एक जलाशय के
समान है और कुछ नहीं|
और इस तरह मैं बंधन और उस से मोक्ष के इस द्वन्द से “मुक्त” हुआ ||
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