समय
समय को महसूस कर पाने की चाह में कितना समय व्यतीत हुआ पता ही नही चला,
घर के एक कोने में आसन जमा में बैठा, उत्सुकता और सहस से भरा हुआ
बेचैन हो गया था|
शिला के समान हो जाने का मेरा व्रत समय की धुरी पर टिका था परन्तु समय से आगे चलने का स्वप्न भी अंकुरित हो रहा था| ज्ञान के भी परे जो काल है उसको देखने का प्रयास था, भूत और भविष्य का विचार तुच्छ सा लग रहा था |
देवी-देवताओं के चिंतन से परे हो चली है अब यह धारा, इसी में बहते हुए मैं सब कुछ भुला रहा था..
स्मृति विस्मृत हो नया रूप ले रही थी, वृत्तियाँ घोर रूप ले प्रत्यक्ष हो रही थी| अभयदान तो मेरे झोले में पड़ा है, इसलिए भय से मुक्त था|
इतना कुछ एक साथ हो रहा था समझ नही पा रहा था मैं.. परन्तु धारा के साथ चलना ही उचित है यह कह बुद्धि ने धीरज बंधाया.
अचानक शोर हुआ, समय ने अपना रुदन कर दिया था, आसन त्यागने का समय हो गया था, कुछ ही क्षण हुए थे इस स्थिति में यह जान मैं हैरान था ..समय का खेल है यह देख मेरे ओष्ठ मुस्कराए और मैं चल दिया ||
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