चित्त की चिता
मानव जीवन संघर्ष का पर्याय है, अपने देह की पुष्टि तो एक चिंता है ही इसको बन्धनों में बाँध उन सम्बन्धियों का पोषण भी चिंता की पावक में पवन का काम करती है | अपने को समृद्ध बनाने की राह में और अपने चिंन्ह छोड़ जाने की लालसा में हम एक अशांत तालाब की भांति हो जाते है | हर क्षण कार्यरत हम प्रकृति के अनुरूप चलते हुए भी खुद को उससे भिन्न मान बैठे हैं | हाँ, यह सही है की मनुष्य की सत्ता प्रकृति के भी परे है परन्तु इसके चलते प्रकृति से द्रोह, गरम सलाख को नंगे हाथों से पकड़ने के समान है | इसी प्रकरण में मेरे मन में विचार उठा की "चिता" क्या है? क्यों आदमी की आखरी सवारी को चिता की संज्ञा दी जाती है? निगमबोध घाट के किनारे यमुना की गत देखते हुए तथा हर क्षण एक देह भस्म होते देख मैं इस नतीजे पर पहुंचा की हम जीवन भर 'चित्तवृत्तियों' के अधीन हो कर्म करते रहते है| कुछ विरलों को छोड़ हम सभी का जीवन हमारे चित्त के अनुरूप ही तो चलता है | मन में आनेवाले विचार चित्त की भूमि में ही तो अंकुरित होते हैं | इसलिए यह कहना की यह चित्त ही मनुष्य का जीवन निर्धारित...