आत्म रूप
बैठा आसन जमाये कुटी में लगाये ध्यान केंद्र भृकुटी पे .. चला चल एक बिंदु के सहारे खड़ा अनंत जगत तेरी राह देखे हो कोई विचार या उद्विग्नता.. अथवा हो कोई भी विघ्न या बाधा कर विश्वास अटल इष्ट पे, पूर्ण समर्पण उसकी शक्ति पे.. भय उखाड़ फेंक ह्रदय से .. निरंकार की ज्योत जलती देख कमल पे.. प्रचंड वेग से बढ़ आगे तू , प्रकृति भी हट छोड़े अपना आगे तेरे .. देव हो या कोई भी योनी.. गीत गाएंगे नाम के तेरे आलौकिक होगा दृश्य वह जब होंगे दर्शन तुझे अपने दिव्य अनंत स्वरूप के |